मन की शांति में बसते हैं ईश्वर

मन में विचारों की भीड़ हो, तो हम ईश्वर को नहींखोज सकते। इसके लिए मन को स्वाभाविक रूप से निर्मल और शांत करना होगा। जे. कृष्णमूर्ति का दृष्टिकोण...

ईश्वर के विषय में बहुत चर्चा करते हैं। आप धर्मस्थल बनाते हैं। पूजा-पाठ करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। कुल मिलाकर, आप ईश्वर विषयक धारणाओं से भरे पड़े हैं। आप ‘ईश्वर’ शब्द तो दोहरा लेते हैं, पर आपके

कर्म तो ईश्वरीय नहीं हैं। आपके तौर- तरीके, आपके विचार, आपका अस्तित्व ईश्वरीय नहीं हैं। आप ईश्वर शब्द दोहराते रहते हैं, साथ ही दूसरों का शोषण करते हैं। आपके अपने-अपने ईश्वर हैं-हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य, सबके अलग ईश्वर।

आप ईश्वर से परिचित हों या न हों, इस शब्द से तो हैं ही। पर यह शब्द ईश्वर नहीं है। शब्द का प्रयोग करने का मतलब यह नहीं है कि आप उसे जानते हैं। जो आप जानते हैं, वह यथार्थ नहीं है। यथार्थ का पता लगाने के लिए मन की सारी शाब्दिकता का बंद होना जरूरी है। आपके यहां ईश्वर की प्रतिमाएं हैं, किंतु वह प्रतिमा ईश्वर नहीं है। आप ईश्वर को कैसे जान पाएंगे? जाहिर है, किसी मूर्ति या किसी धर्मस्थल के जरिये तो नहीं। ईश्वर को

अर्थात अज्ञात को ग्रहण करने के लिए मन को भी तो अज्ञात होना पड़ेगा। यदि आप ईश्वर की तलाश में हैं, तो इसका मतलब है कि आप उसे जानते हैं, वरना आप उसे ढूंढ़ते ही नहीं। लेकिन बिना जाने आप उसे या तो अपनी पुस्तकों के मताबिक ढूंढ़ते हैं या अपनी भावनाओं के अनुरूप। आपकी भावनाएं आपकी स्मृति की प्रतिक्रियाएं मात्र हैं। इसलिए जिसे आप ढूंढ़ रहे हैं, वह पहले से ही गढ़ लिया गया है। स्मृति द्वारा यासुनी-सुनाई बातों द्वारा। लेकिन जो पूर्व निर्मित है, वह मन की ही उपज है। अगर किताबें नहीं होतीं, गुरु नहीं होते, दोहराने के लिए सूत्र नहीं होते, तो आपको पता होता केवल दुख और सुख का। तब आप जानना चाहते कि आपको दुख क्यों

होता है। आप शीघ्र ही दुख से पलायन के लिए देवताओं का आविष्कार कर लेते। किंतु यदि आप दुख की समग्र प्रक्रिया को वस्तुत: समझना चाहते हैं, एक नूतन मानव की तरह, तब पलायन नहीं करेंगे, बल्कि सजगता से स्वयं को दुख से मुक्त कर लेंगे। इसी तरह आप सजगता से ही खोज सकते हैं कि ईश्वर क्या है? पर जो मनुष्य

दुख से ग्रस्त है, वह ईश्वर अथवा यथार्थ को नहीं खोज पाता।

यथार्थ को तभी खोजा जा सकता है, जब भीतर प्रसन्नता विद्यमान होती है। यथार्थ तभी अस्तित्व में आ सकता है, जब मन पूर्णरूपेण स्थिर हो। शांति, स्थिरता तभी होती है, जब बेचैन करने वाले विचार नहीं रहते। विचार का प्रतिरोध करने से कुछ होने वाला नहीं है। विचारों को महसूस कर लेना आवश्यक है। तब मन स्थिर व प्रशांत होता है। यथार्थ प्रकट होता है। अत: यह आवश्यक है कि मन सरल हो, विश्वासों व कल्पित धारणाओं से लदा हुआ न हो Watch Spiritual Videos
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